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गुड फ्राइडे का ऐतिहासिक महत्व - डॉ.श्रीनिवास महावर

By Goapl Gupta · 02 Apr 2026 · 100 views
रिपोर्ट - शिरीष नाथ माथुर
गुड फ्राइडे का ऐतिहासिक महत्व - डॉ.श्रीनिवास महावर
उदयपुर दिनांक अप्रैल 02, 2026 | जनमत मंच के तत्वाधान में गुड फ्राइडे के ऐतिहासिक महत्व पर चर्चा की गई। इस अवसर पर जनमत मंच के संस्थापक एवं अध्यक्ष डॉ.श्रीनिवास महावर ने बताया कि-
गुड फ्राइडे ईसाई धर्म का एक प्रमुख त्यौहार है,जो ईसा मसीह के बलिदान और उनके क्रूस (सूली) पर चढ़ने की याद में शोक दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन ईस्टर संडे से पहले शुक्रवार को आता है, इस बार 3 अप्रैल को धूमधाम से मनाया जाएगा। माना जाता है कि यीशु ने मानव जाति के पापों की मुक्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया था।
ईसा मसीह (यीशु) का जन्म लगभग 4-6 ईसा पूर्व में फिलिस्तीन (अब इजरायल) के बेथलहम नामक स्थान पर हुआ था। उनकी माता का नाम मरियम और पिता का नाम यूसुफ था। बाइबल और ईसाई धर्मग्रंथों के अनुसार ईसा मसीह पवित्र आत्मा द्वारा मरियम के गर्भ से जन्मे थे।
ईसा मसीह को रोमन सम्राट टिबेरियस के शासनकाल में, यहूदिया के रोमन गवर्नर पोंटियस पिलातुस (Pontius Pilate) ने यरूशलेम के यहूदी धर्मगुरुओं के दबाव में क्रूस पर चढ़वाया था। उन पर राजद्रोह और खुद को "यहूदियों का राजा" कहने के झूठे आरोप लगाए गए थे ।
क्रूस पर चढ़ाने के मुख्य कारण :
• धर्मगुरुओं की नाराजगी: ईसा मसीह ने स्थापित धार्मिक नियमों को चुनौती दी थी और खुद को ईश्वर का पुत्र कहा था, जिसे यहूदी नेताओं ने इसे निंदा माना।
• राजनीतिक खतरा: उन पर यहूदियों के बीच विद्रोह भड़काने और रोमन साम्राज्य को चुनौती देते हुए 'राजा' होने का दावा करने का आरोप लगाया गया।
• प्रशासनिक दबाव: रोमन गवर्नर पोंटियस पिलातुस शुरू में उन्हें छोड़ना चाहता था, लेकिन भीड़ और यहूदी नेताओं के दबाव के कारण उसने उन्हें सूली पर चढ़ाने का आदेश दे दिया ।
"गुड" क्यों कहते हैं? इस दिन को 'गुड' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह दुखद दिन ईसाई धर्म में मानवता के लिए यीशु के सर्वोच्च बलिदान, प्रेम और मुक्ति की शुरुआत माना जाता है। इसे 'होली फ्राइडे', 'ग्रेट फ्राइडे' या 'ब्लैक फ्राइडे' भी कहते हैं।
ईसाई धर्म के अनुयायी इस दिन चर्च में विशेष प्रार्थना सभाओं में भाग लेते हैं, उपवास रखते हैं और यीशु के अंतिम संदेशों को याद करते है।
मंच के सचिव शिरीष नाथ माथुर ने बताया की , रोमन अधिकारियों द्वारा यहूदी नेताओं के दबाव में ईसा मसीह को यरूशलेम में कलवारी नामक स्थान पर क्रूस पर चढ़ाया गया था।
सहायक आचार्य आजाद मीणा ने बताया कि ईसा मसीह ने मानवता को पापों से बचाने और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया था, जिसके लिए उन्होंने अपमानजनक मृत्यु (सूली) को स्वीकार किया।
यद्यपि यह दिन दुखद है, फिर भी इसे 'गुड' कहा जाता है क्योंकि यह मानव जाति के उद्धार (salvation) और ईश्वर के प्रेम की सर्वोच्च विजय का प्रतीक माना जाता है।
इस अवसर पर उपस्थित सहाय आचार्य, हेमंत कुमार डामोर , एवं धर्मेंद्र कुमार वर्मा, ने बताया कि-
उनका जीवन और शिक्षाएं प्रेम, क्षमा, और निस्वार्थ सेवा पर आधारित थीं, जो मानव जाति को पापों से मुक्ति और अनंत जीवन का मार्ग दिखाती हैं। उन्होंने अपनी मानवता के माध्यम से सभी मनुष्यों के कष्टों को समझा और अपना बलिदान देकर एक सार्वभौमिक भाईचारे का उदाहरण पेश किया।
ईसा मसीह का संदेश केवल किसी एक धर्म या संप्रदाय के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए है।

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