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77वां गणतंत्र : अधिकार नहीं, कर्तव्य से विश्वगुरु बनने का संकल्प: डॉ॰ प्रदीप कुमावत

By Goapl Gupta · 26 Jan 2026 · 20 views
77वां गणतंत्र : अधिकार नहीं, कर्तव्य से विश्वगुरु बनने का संकल्प: डॉ॰ प्रदीप कुमावत

भारत का गणतंत्र औपचारिक रूप से 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, जबकि स्वतंत्रता हमें 15 अगस्त 1947 को प्राप्त हो चुकी थी। यह तथ्य ऐतिहासिक रूप से सर्वविदित है कि यदि केवल वर्षों की गणना की जाए तो हमारा गणतंत्र नवंबर 1949 में ही पूर्णता की अवस्था में पहुँच गया था, क्योंकि 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा ने भारतीय संविधान को अंगीकृत कर लिया था। किंतु राष्ट्र के भविष्य को शुभ और स्थिर आधार देने के लिए 26 जनवरी का चयन किया गया — वह तिथि, जिस दिन 1930 में ‘पूर्ण स्वराज’ की घोषणा हुई थी। इस प्रकार 26 जनवरी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारत के आत्मसम्मान, संकल्प और स्वशासन की चेतना का प्रतीक है।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने यह निर्णय लिया कि वह किसी बाहरी व्यवस्था या विदेशी कानून के सहारे नहीं, बल्कि अपने स्वयं के संविधान के आधार पर चलेगा। यह संविधान संसार का सबसे बड़ा लिखित संविधान है — न केवल शब्दों की दृष्टि से, बल्कि विचारों, मूल्यों और सांस्कृतिक संदर्भों की दृष्टि से भी। यह सत्य है कि भारतीय संविधान पर ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था सहित अनेक वैश्विक संविधानों का प्रभाव पड़ा, किंतु यह कहना भी उतना ही सत्य है कि बीते 77 वर्षों में हमने इस संविधान को अपने देश, समाज और परिस्थितियों के अनुरूप ढाल लिया है। आज हम निःसंकोच यह दावा कर सकते हैं कि यह संविधान भारतीय आत्मा से जुड़ा हुआ संविधान है।
भारतीय संविधान की एक विशेषता यह भी है कि इसके प्रत्येक अध्याय, प्रत्येक अनुच्छेद के पीछे केवल कानूनी सोच नहीं, बल्कि सभ्यतागत चेतना कार्यरत है। संविधान की मूल प्रति के प्रत्येक पृष्ठ पर अंकित दुर्लभ चित्रण — रामायण, महाभारत, बुद्ध, महावीर, अशोक, शिवाजी और स्वतंत्रता आंदोलन तक की झलक — यह प्रमाण है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने भारत के इतिहास और संस्कृति को केवल स्वीकार ही नहीं किया, बल्कि उसे सम्मानपूर्वक स्थान दिया।
संविधान में समय-समय पर किए गए संशोधनों के साथ कुछ शब्द जोड़े गए, जिनमें ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द भी सम्मिलित है। इस शब्द को लेकर आज भी व्यापक विमर्श की आवश्यकता है। भारत की परंपरा में ‘धर्म’ का अर्थ किसी पूजा-पद्धति या संप्रदाय तक सीमित नहीं रहा है। धर्म का मूल अर्थ है — जो धारण किया जा सके, जो व्यवस्था को संतुलित रखे। राजधर्म, प्रजाधर्म, गृहस्थ धर्म, नारी धर्म, पुत्र धर्म — ये सभी जीवन को मर्यादा और उत्तरदायित्व प्रदान करने वाली संकल्पनाएँ हैं। इस दृष्टि से भारत ‘धर्मनिरपेक्ष’ नहीं, बल्कि ‘धर्मसापेक्ष’ राष्ट्र रहा है, जहाँ प्रत्येक व्यवस्था का अपना धर्म है। ऐसे में इस विषय पर संसद और लोकसभा में गंभीर, वैचारिक और निर्भीक चर्चा होनी चाहिए।
आज 77 वर्षों बाद यदि हम आत्ममंथन करें, तो एक बड़ा प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है — क्या हम अपने अधिकारों जितने सजग अपने कर्तव्यों के प्रति भी हैं? अधिकारों के उल्लंघन पर न्यायालयों का द्वार खटखटाना हमारी सजगता का प्रमाण है, किंतु कर्तव्यों की उपेक्षा हमारी सामाजिक कमजोरी को भी उजागर करती है। आज तक ऐसा कोई उदाहरण स्मरण में नहीं आता, जहाँ किसी नागरिक ने अपने कर्तव्य के निर्वहन के अधिकार को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया हो।
कर्तव्य की पहली पाठशाला विद्यालय नहीं, बल्कि परिवार होता है। जब एक माँ अपने व्यक्तिगत अधिकारों से ऊपर उठकर अपने बच्चे और परिवार के लिए समर्पित होती है, तभी शिशु के मन में कर्तव्य की प्रथम अनुभूति जन्म लेती है। इसीलिए कहा गया है — ‘जिस घर में संस्कारित माँ होती है, वहाँ पूरा परिवार संस्कारित होता है।’ सनातन संस्कृति में नारी को कभी दोयम दर्जे का नहीं माना गया। शक्ति के बिना शिव भी शव हैं — यह केवल कथन नहीं, बल्कि दर्शन है। दुर्गा सप्तशती में देवता स्वयं युद्ध नहीं करते, बल्कि अपनी शक्तियों को एकत्र कर माँ काली में स्थापित करते हैं, जो असुरों का संहार करती हैं। यह भारतीय दृष्टि है — जहाँ नारी केंद्र में है।
इसके विपरीत, पश्चिमी समाजों का इतिहास स्त्रियों के प्रति भेदभाव से भरा रहा है। अनेक पश्चिमी देशों में स्त्रियों को मतदान, संसद और सार्वजनिक जीवन से लंबे समय तक वंचित रखा गया। आज भी तथाकथित प्रगतिशीलता के मुखौटे के पीछे नस्लवाद और लैंगिक भेदभाव विद्यमान है। जितना नस्लवाद अमेरिका और यूरोप में दिखाई देता है, उतना कठोर रूप हमारी पारंपरिक सामाजिक संरचना में मूल रूप से नहीं था।
भारत की जाति-व्यवस्था मूलतः कर्म आधारित थी, जन्म आधारित नहीं। स्वर्णकार, लोहार, बढ़ई — ये सभी कर्म से पहचाने जाते थे। किंतु समय के साथ यह व्यवस्था जड़ हो गई और कर्मजा व्यवस्था जन्मजा बन गई। यही वह मोड़ था जहाँ समाज ने आत्मचिंतन करना छोड़ दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूजनीय माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने स्पष्ट कहा था कि यदि हिंदू समाज को संगठित और सशक्त बनाना है, तो अंतरजातीय विवाहों को बढ़ावा देकर समरसता और समानता का भाव विकसित करना होगा।
77वें गणतंत्र वर्ष में भारत की प्रगति केवल विचारों तक सीमित नहीं है। औद्योगिक, तकनीकी और आर्थिक क्षेत्रों में भारत ने उल्लेखनीय छलांग लगाई है। जिस सेमीकंडक्टर चिप के लिए हम कोविड काल में संघर्ष कर रहे थे, आज वही चिप हमारे देश में बन रही है। मोबाइल फोन, वाहन और औषधियाँ — जो कभी आयात का विषय थीं — आज 100 से अधिक देशों में निर्यात हो रही हैं। अमेरिका जैसे देश भी आज भारतीय दवाओं पर निर्भर हैं।
इतिहास साक्षी है कि भारत की आर्थिक रीढ़ को सबसे पहले मुगलों ने कमजोर किया और अंग्रेजों ने उसे लगभग तोड़ ही दिया। सात लाख से अधिक शिक्षा केंद्रों को बंद कर देना, किसानों को नीतियों के माध्यम से जकड़ देना, और देश को योजनाबद्ध भुखमरी की ओर धकेलना — यह सब भारत की सभ्यता पर किया गया एक सोचा-समझा आक्रमण था। फिर भी, भारत गिरा नहीं। भारत रुका नहीं। आज भारत जाग चुका है।
आज भारत विश्वगुरु बनने की सीढ़ी की अंतिम पायदान पर खड़ा है। अब केवल छलांग लगाने की आवश्यकता है — और यह छलांग हमारे युवा लगाएंगे। आइए, इस 77वें गणतंत्र दिवस पर हम संकल्प लें कि हम अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति भी उतने ही सजग होंगे। हम एक बार फिर उस अखंड भारत की कल्पना को साकार करेंगे, जो ज्ञान, करुणा और शक्ति का केंद्र था।
डॉ॰ प्रदीप कुमावत
विचारक ,लेखक, लाफ्टर गुरू, फिल्म निर्माता
सम्प्रतिनिदेशक आलोक संस्थान)

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